सामने इत्तेफाक था
कुछ ख़ास था कुछ ख़ाक था
पत्थर पे लिखे नाम थे
या सिमटे सुकुड़े वादे थे
नींद बेच के कुछ सपने खरीदे थे
गुजरी हुयी मोहब्बतों के कसीदे थे
पाओं संभाल के क्यों रखना था
जमीं पे यादों का जो बिछौना था
उधार की जिंदगी थी
या क़र्ज़ की मुस्कुराहटें
कहने को तो बहुत बातें थी
हर बात पे थी आहटें
सामने इत्तेफाक था
कुछ ख़ास था कुछ ख़ाक था
कुछ ख़ास था कुछ ख़ाक था
पत्थर पे लिखे नाम थे
या सिमटे सुकुड़े वादे थे
नींद बेच के कुछ सपने खरीदे थे
गुजरी हुयी मोहब्बतों के कसीदे थे
पाओं संभाल के क्यों रखना था
जमीं पे यादों का जो बिछौना था
उधार की जिंदगी थी
या क़र्ज़ की मुस्कुराहटें
कहने को तो बहुत बातें थी
हर बात पे थी आहटें
सामने इत्तेफाक था
कुछ ख़ास था कुछ ख़ाक था
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