Friday, June 28, 2013

Adhure khwab.

अधूरे ख्वाब दवा है
अधूरे ख्वाब यानि की
अभी चलना बहोत बाकि
नींद गर टूटी
आंख मल पानी मार चेहरे पे
ख्वाब हकीक़त करने के लिए
किस्मत ने खाई दी
मेहनत लगेगी भरने के लिए
कुछ अधूरे ख्वाब रहे
ये अच्छा है
नीरस जिंदगी न हो जाए
हम धार में न बहे
लड़े थोडा स्वार्थी रहे
जब ख्वाब पुरे हो
नए ख्वाब ठान ले
चहकती रहे जिंदगी
अधूरे ख्वाब दवा है
महकती रहे जिंदगी
रुक जाएंगे तो ठंडे पड़ेंगे
सडन हो जाएगी
ख्वाब लालच रहे
बहकती रहे जिंदगी
हाँ मानता हूँ
ख्वाब अधूरे दर्द देते हैं
कभी आँखों को नींद नहीं
दिल में करार नहीं
पर कुछ ख्वाब अधूरे से
मुझे ले आये है
यहाँ हौसला बन के
जब भी अधूरापन खटका
मै दौड़ा पीछे पीछे
पूरा करने के लिए
ख्वाब पुरे हुए
जिंदगी बिना ख्वाबो के
ये आंखे भी क्या करे
चल नए ख्वाब गढ़ ले
मै कुम्हार, ख्वाब मेरे कच्ची माटी घड़े
गर आज सारे भट्टियो में झोक के
सब के सब पुरे हुए
कल न माटी रहे चक्का घुमे
मै क्या करूँगा बोलिए
घड़े नए गढे
बेहतर कुछ ख्वाब कच्चे रहे
Shashi prakash saini.
This is a guest post done by none other than shashi prakash saini who has already proved his mettle in poetry with his e book saamarthya. He needs no introduction. I cant thank him enough for doing this guest post for me. I discovered him through Blog a ton and I have been a fan since then.

6 comments:

  1. Behtareen.. So thoughtful poem. Liked it Shashi.

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  2. अधूरे ख्‍वाब नींद तोड़ते हैं, यह शुभ है, अच्‍छी कविता के आभार

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  3. well.. hopes kept intact .. thanks to the unaccomplished dreams .. life looks a struggle yet .. unfulfilled dreams push me to live and crave and be excited ..
    Shashi ji is this beyond wonderful .. thoughtful and inspiring too :)

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  4. सराहना हेतु आभार आप सभी का

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